क्या कुछ बदला है ?

क्या कुछ बदला है ?

By Shobha Sundharam

क्या क्म कर पायेगा कफन
क्योंकि साल तो बेशख है नया
लेकिन अंदाज़ अब भी है पुराना
मौत का खौफ है दिल में अब भी बरकरार
अबला का होता है अब भी बलात्कार
क्या यह साल रख सकेगा सबको मेहूफूस
या अपनों को खो देने का करना होगा एक बार फिर अफसोस
काश् हर पल एक ही हो आलम
उस उगते सूरज की तरह
जो रात की चादर में छिप् कर
सुभा को अपनी किरनो से
उम्मीद की किरण बिखेर देता है

क्या कुछ बदला है ?
सूरज की किरण में मैंने देखा नहीं कम तेज
रात भी अपनी जगह है
ख़ामोशी में लिपटी हुई तारों के बीच से होते हुए
चाँद को निहारते हुए
फिर सुबहे के रथ पर सवार होकर
उस सूरज का आगमन करते हुए
फिर से अपने समय के बिछौने पर बस कर
दिन ढलने का इंतज़ार करती रहती है ,
क्या कुछ बदला है?
हाँ सिर्फ एक साल ……

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